कहानियां,
अक्सर मुझे ढूंढ लेती है ।
कहीं भीड़ में छुपी हुई, कहीं स्टेज पर चढ़ कर पुकारती है,
किसीकी शैतानी आंखों से, किसी आशिक के दिल से,
दिल फाड़ कर रुला देती है, याद दिला कर कुछ लम्हें,
कभी हंसा देती है, भूला कर दर्द कुछ पुराने,
झांकती है किसी किताब के पीछले पन्नों से शेर बनकर,
या कभी पुरानी नोवेलके पैराग्राफके बीच डूडल बनकर,
गुनगुनाती है कभी दार्जिलिंग की वादीयोंमें घूमते हुवे,
गालियां सुनाती है कभी मुंबई लोकलमें पीसते हुवे,
बदामी चेहरोंकी ज़ुर्रीयोंमें, मुस्कुराती पलकोंकी नमींओंमें,
हाथोंकी घिसी हुई लकीरोंमें, मज़दूरके पांवों के छालोंमें,
कहानी - एक ज़रिया है दिलों को समझने का,
कहानी - एक तरीका है अपनी बात बताने का,
मैं आँखें मूँद भी लूं, या उलझ जाऊं झिंदगी में कभी,
कहानियां,
अक्सर मुझे ढूंढ लेती है ।
- समीर
अक्सर मुझे ढूंढ लेती है ।
कहीं भीड़ में छुपी हुई, कहीं स्टेज पर चढ़ कर पुकारती है,
किसीकी शैतानी आंखों से, किसी आशिक के दिल से,
दिल फाड़ कर रुला देती है, याद दिला कर कुछ लम्हें,
कभी हंसा देती है, भूला कर दर्द कुछ पुराने,
झांकती है किसी किताब के पीछले पन्नों से शेर बनकर,
या कभी पुरानी नोवेलके पैराग्राफके बीच डूडल बनकर,
गुनगुनाती है कभी दार्जिलिंग की वादीयोंमें घूमते हुवे,
गालियां सुनाती है कभी मुंबई लोकलमें पीसते हुवे,
बदामी चेहरोंकी ज़ुर्रीयोंमें, मुस्कुराती पलकोंकी नमींओंमें,
हाथोंकी घिसी हुई लकीरोंमें, मज़दूरके पांवों के छालोंमें,
कहानी - एक ज़रिया है दिलों को समझने का,
कहानी - एक तरीका है अपनी बात बताने का,
मैं आँखें मूँद भी लूं, या उलझ जाऊं झिंदगी में कभी,
कहानियां,
अक्सर मुझे ढूंढ लेती है ।
- समीर
No comments:
Post a Comment