वो कहते हैं के हम ताज-महाल को राम-महाल बना देंगे...
पर साहब, भीतर सोयी मुमताज़ को कहाँ दफनाएंगे???
मुहोब्बत के उस मुजस्सीमे को भी भगवा पहनायेंगे...
प्रेम-गीत की जगह अब तो भजन-जग्रता करवाएँगे...
पृथ्वीराज तक को नहीं छोड़ा हम ने, कान्हा को भी तो सताया है,
क्या सोचा शाहजहाँने, हम इश्कबाज़ी यूँ सेह जाएंगे???
इस्लाम और हिंदुता अगर धर्म है,
तो मुहोब्बत क्या चीज़ है यारो,
इंसानियत सड़ रही है पड़ी कोने में,
मुहोब्बत को तो मत मारो...
छोड़ के सारे भेद-भाव
चाहे इतिहास को तुम बदल डालो,
इंसानियत सड़ रही है पड़ी कोने में,
मुहोब्बत को तो मत मारो...
मुहोब्बत को तो मत मारो...